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जूनियर अमिताभ नहीं रहे। आज सुबह हार्ट अटैक के चलते हुई उनकी मृत्यु

जूनियर अमिताभ नहीं रहे। आज सुबह हार्ट अटैक के चलते उनकी मृत्यु हो गई। इनका वास्तविक नाम फिरोज़ खान था। सालों से ये फिल्म इंडस्ट्री में अमिताभ बच्चन के डुप्लीकेट के तौर पर मशहूर थे। साल 1968 में इनका जन्म हुआ था। जब ये नौजवानी की तरफ बढ़े तो इनके दोस्तों ने इनसे कहना शुरू किया कि तुम तो अमिताभ बच्चन जैसे दिखते हो। दोस्तों का ऐसा कहना इन्हें बड़ा पसंद आता था।

फिर एक वक्त वो आया जब ये रोज़ शीशे के सामने खड़े होकर अमिताभ बच्चन की नकल करते थे। उनकी तरह बोलने की कोशिश करते। उनके जैसे कपड़े पहनते। अमिताभ के मैनेरिज़्म को कॉपी करते। अमिताभ की तरह चलने, बात करने व देखने की प्रैक्टिस करते। फिरोज़ के घरवाले उनकी इस आदत से बड़े परेशान हो गए थे। घरवाले इन्हें खूब डांटा करते थे। कहते थे ये सब छोड़ दो। ये ज़िंदगी में काम नहीं आएगा।

घरवालों के तानों से परेशान होकर एक दिन फिरोज़ खान ने अपना घर और अपना शहर बदायूं छोड़ दिया और ये मुंबई आ गए। मगर कुछ दिन बाद जब इनके पैसे खत्म हो गए तो ये एक दफा फिर से घर वापस लौट गए। घरवालों ने खूब खरी-खोटी इन्हें सुनाई। ये सब चुपचाप सुनते रहे। हालांकि कुछ सालों बाद ये फिर से मुंबई भाग गए। ये 90 के दशक की शुरुआत थी। उन दिनों फिल्म इंडस्ट्री में विजय सक्सेना नाम के एक एक्टर हुआ करते थे।

विजय सक्सेना को डुप्लीकेट अमिताभ बच्चन कहा जाता था। वो भी अमिताभ बच्चन की नकल ही करते थे। विजय सक्सेना ने कुछ फिल्मों में भी काम किया था। रामगढ़ की शोले फिल्म में भी विजय सक्सेना ने काम किया था। लेकिन दुर्भाग्यवश साल 1994 में विजय सक्सेना एक मोटर साइकिल दुर्घटना में मारे गए। इस तरह जूनियर अमिताभ बच्चन की जगह खाली हो गई। जिसे आखिरकार फिरोज़ खान ने भरा।

साल 1995 में फिरोज़ खान एक दोस्त के साथ फिर से मुंबई पहुंचे। इनका वो दोस्त अक्षय कुमार का डुप्लीकेट था। हालांकि कुछ साल फिल्म इंडस्ट्री में संघर्ष करने के बाद वो दोस्त वापस अपने घर लौट गया था। लेकिन फिरोज़ खान इस दफा नहीं लौटे। वो कई महीनों तक ऑडिशन देते रहे। संघर्ष करते रहे। उस वक्त फिरोज़ खान एक रेलवे स्टेशन के पास सोया करते थे। पास ही एक किराने की दुकान मौजूद थी। वो दुकानदार एक दिन इनसे बात करने लगा। बातों-बातों में पता चला कि वो दुकानदार भी यूपी के बदायूं का ही था। इस तरह उस दुकानदार ने फिरोज़ खान को अपनी दुकान में सोने की इजाज़त दे दी। शर्त ये थी कि शाम के कुछ वक्त फिरोज़ खान को हिसाब-किताब में उसका साथ देना होगा।

फिरोज़ खान का नसीब धीरे-धीरे बदलना शुरू हुआ। इन्हें स्टेज शोज़ में काम मिलने लगा। ये स्टेज शोज़ में नकली अमिताभ की हैसियत से जाने लगे। मुंबई के अलावा दूसरे शहरों से भी इन्हें बुलावा आने लगा। और इस तरह फिरोज़ खान के हाथ में पैसा भी आने लगा। साल 1997 में फिरोज़ खान को रिन साबुन के विज्ञापन में काम करने का मौका मिला। उसके बाद तो इन्हें और भी कुछ विज्ञापनों में काम मिला। कई छोटे बजट की फिल्मों में इन्हें बच्चन साहब के हमशक्ल के रोल मिलने लगे। और इस तरह फिरोज़ खान की ज़िंदगी धीरे-धीरे पटरी पर आने लगी थी।

फिरोज़ खान की सबसे बड़ी उपलब्धि थी साल 2008 में आई ऑस्कर विनिंग फिल्म स्लमडॉग मिलेनियर। इस फिल्म में भी फिरोज़ खान ने डुप्लीकेट अमिताभ बच्चन का कैरेक्टर प्ले किया था। उसके बाद और भी कुछ फिल्मों व कई टीवी शोज़ में फिरोज़ खान दिखे थे। और अब फिरोज़ खान ये दुनिया छोड़कर जा चुके हैं। फिरोज़ खान जी को किस्सा टीवी का नमन। #juniorAmitabhBachchan

साभार किस्सा टीवी

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