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Friday, Jun 14, 2024
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सुबह जितेंद्र, दोपहर को धर्मेंद्रऔर रात को राजेंद्र कैसे बन गए मोहम्मद रफी

ʺमैं राही अनजान राहों का, यारो मेरा नाम अनजानाʺ गाने में गजब की ताजगी, उत्साह और जोश है। पर्दे पर इस गाने के फिल्मांकन में राजेन्द्र कुमार के चेहरे पर जो ताजगी और उत्साह देखते हैं उसी तरह की ताजगी और उत्साह इस गीत को गाने वाले गायक की आवाज में नजर आती है। लेकिन आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि जिस गाने में गजब की ताजगी और जोश नजर आता है उस गाने को गायक ने उस दिन, दिन भर चार गानों का रिहर्सल और उन चार गानों को रेकार्ड करने के बाद देर रात – करीब करीब आधी रात को रेकार्ड किया था जब गायक पूरी तरह से थक कर चूर हो गए थे।

यह कमाल मोहम्मद रफी साहब ने सन् 1969 में एक दिन किया था। उस एक दिन एक नहीं पूरे पांच गाने को रेकार्ड करके रफी साहब ने एक रेकार्ड बनाया था। वो कौन-कौन से गाने थे जो उस दिन रेकार्ड हुए।

उस साल 1969 के दिन वाकई कमाल हो गया। रफी साहब कुछ महीनों के लिए हज यात्रा और विदेश यात्रा पर जाने वाले थे, इसलिए अपने हाथ में लिए गीत फटाफट निबटा रहे थे। ऐसे में एक दिन लक्ष्मीकांत–प्यारेलाल उनके पास पहुंचे और आग्रह किया कि उनकी फिल्मों के पांच गीत तो रिकार्ड होने बाकी हैं और फिल्मों की शूटिंग भी प्रारंभ हो रही है। अब क्या करेंॽ रफी साहब मुस्कुरा के बोले, ʺधुनें तैयार कर लो, एक दिन में ही पांच गीत गा लूंगा।ʺ और उस दिन वाकई एक गजब का रिकॉर्ड स्थापित हो गया।

फेमस रिकार्डिंग स्टूडियो, ताड़देव इस रिकॉर्ड का गवाह बना। सुबह की शुरुआत हुई फिल्म मां और ममता के दो युगल गीतों की रिकॉर्डिंग से ʺरूत बेकरार हैʺ तथा ʺअपने नैनों को समझा दोʺ जो जीतेन्द्र–मुमताज पर चित्रित होने थे।

इन दो गीतों को पूरा कर वह फिल्म ʺमन की आंखेंʺ का गीत ʺदिल कहे रूक जा रे रूक जाʺ रिकॉर्ड करवा रहे थे कि धर्मेन्द्र के छोटे भाई कुंवर अजीत सिंह देओल (अभय देओल के पिता) अपने जलंधर के कई दोस्तों के साथ स्टुडियो पहुंच गए। वे सभी रफी साहब के दीवाने थे और उन्हें अपनी आंखों के सामने साक्षात गाते हुए देखना चाहते थे। जाते ही कुंवर अजीत सिंह ठेठ पंजाबी में रफी साहब से बोले, ʺरफी पाजी, सतश्री अकालʺ। रफी साहब ने अभिवादन का हंसते हुए जवाब दिया और फिर थोड़ी मस्ती में बोले, ʺअजीते, चुपकर यार, इस वक्त मैं धर्मेन्दर हूं सुबह जीतेन्दर था और रात को राजिन्दर बन जाउंगाʺ। इसके बाद शाम को इसी फिल्म का एक गीत जो लताजी के स्वर में था और अंत में रफी साहब गाते हैं। गीत था – ʺचला गयाʺ की रिकार्डिंग हुई। लताजी गीत गाकर अपने घर भी चली गईं, रात के नौ बजने जा रहे थे लेकिन रफी साहब और लक्ष्मी–प्यारे को कहां चैन थाॽ और देर रात तक रफी साहब ने राजेन्द्र कुमार बन फिल्म अनजाना का एक गीत ʺमैं राही अनजान राहों का, यारो मेरा नाम अनजानाʺ बिना किसी थकान और झुंझलाहट के रिकॉर्ड करवाया, तब जाकर लक्ष्मीकांत–प्यारेलाल ने चैन की सांस ली। और किसी भी संगीत पारखी से पूछ लीजिए, पांचों गीतों में रफी साहब ने कमाल ही किया है हमेशा की तरह।

लक्ष्मीकांत प्यारेलाल इस बारे में कहते हैं ʺहमारा और रफी साहब का साथ अट्ठाईस वर्षों का रहा। एक बार हमें मालूम हुआ कि एक दिन बाद ही रफी साहब विदेश यात्रा पर जा रहे हैं। हम तुरन्त उनके पास पहुँचे और अपनी परेशानी बताई-‘‘हमारे पाँच गाने रह गए हैं, यदि रिकार्ड नहीं हुए, तो फिल्में दो-दो महीने लेट हो जाएँगी।” रफी साहब बड़े दुखी हुए कि उनकी वजह से किसी का नुकसान होगा। फिर बोले-‘मगर एक दिन में पाँच गाने रिकार्ड कैसे कर सकोगे?’ हमने कहा-‘‘कोशिश करके देखते हैं।” रफी साहब ने सारा काम छोड़कर अगला दिन हमें दे दिया।ʺ

प्यारेलाल जी कहते हैं ”वे चले गए, हमारा संगीत अनाथ हो गया। भविष्य की बात हम नहीं कहते, मगर आज कोई दूसरा रफी नहीं है!’’

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